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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



दिवास्वप्न


पूनम भार्गव


   

दुःख को उछालना चाहती हॅू
जैसे हवा में उड़ा दिया था दुपट्टा
बिना सोचे कि मेरे खुले सीने पर
तुम्हारी निगाहें टिकी हैं
मैं तुम्हारे इर्द-गिर्द ओढनी का
बंदोबस्त करना चाहती हॅू

लुढकाना चाहती हॅू
महावर से भरा कटोरा
सुन्दर लकीरें चैड़ी कर सकूँ
भर-भर कर रंग सकूँ तुम्हारे
हाथ-पाँव
आखि.र कब तक तुम लहू से
रंगते रहोगे अपने हाथ

अबीर मल दूॅ तुम्हारे चेहरे पर
गुलाल से भर दूॅ माॅग तुम्हारी
जानते हो क्यों घ्
केवल मैं ही कमसिन नहीं रहना चाहती
थोड़ा सा तुम्हें भी नाजुक देखने की
ख्वाहिशें उमड़ रहीं हैं 

अपने जुड़े में नहीं खोंसना चाहती
कोई गुलाब के फूल
तुम्हारी अंजुरी को भरना चाहती हॅू
हरसिंगार से
खुशबू से भर जाओ और बारूद की
गन्ध से उबर आओ तुम

मेंहदीं लगी हथेलियों को 
तुम्हारी हथेलियों से चिपका कर
चाहती हॅू कि तुम भी सूॅघों
अपनी हथेलियों में देह के एहसास
ताकि तुम मिट्टी के तेल और
जले इंसानी माँस की 
गंध भूल जाओ
तुम्हें देखूँ रंगीन कपड़ों में
मुझे लुभाने की चेष्टा में 
आज मुझे खालिस सफे.द पैरहन को लपेट कर
सुखों की सुहागन बनना लुभा रहा है
आओ तुम्हें भी इन्द्रधनुष पहना दॅू

नहीं पड.ना चाहती पंखों के प्रेम में
तुझे तितलियों के तिलिस्म में
जकड.ना चाहती हॅू
मैं ऐयारी का लुत्फ. उठाऊॅ
और तुम मुझे कै.दी बनाने के 
जूनून से बाहर आओ

अनुग्रह की जगह बोली में अक्खड.पन
संवार लेना चाहती हॅू
और तुम्हारी जीभ पर मिठास का 
दैवीय चमत्कार चाहती हॅू
ये अदला-बदली समझा दे तुम्हें 
शब्दों की कैफि.यत

सोचती हॅू तुम्हें दोबारा से
संवारने का ख्याल इतना उम्दा
पर पेचीदा क्यों   

आज तुम्हें  मिट्टी का पिंड बनाना चाहती हॅू
दोबारा अपने निर्माता का
आवाह्न करना चाहती हूँ
थोड़ी अपनी माटी तेरी मजबूत काठी में
गूँथना चाहती हॅू

कि अब जब भी तुम थामों हाथ मेरा
मजबूती और कोमलता का संगम
व्याप्त मानसिकता को 
नेपथ्य में धकेल
नये आयाम स्थापित करें
सुख-दुःख
समान नियम से संचालित हों !!!


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