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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



हाँ ! मैं श्वेत हूँ


निशा नंदिनी गुप्ता


   
हाँ  ! मैं श्वेत  हूँ 
बनो तो ,मेरे समान बनो 
देखते ही आभा मेरी 
सब हो जाते आकर्षित 
मेरी अपनी अलग गरिमा है 
सब रंगों से अलग महिमा है ,
उज्ज्वलता मेरी सबको भाति
नहीं किसी से द्वेष -ईर्ष्या 
सभी रंग है मेरे साथी ,
सभी रंग मुझमें मिलने को 
रहते आकुल 
खो कर निजता अपनी 
वे लेते भव्य रूप, 
खोकर अपनी कालिमा
काला भी बन जाता सलेटी 
अस्तित्व लाल का प्रेमिल हो 
गुलाबी बन जाता है 
और खोकर अपनी नीलिमा 
नीला आसमानी हो जाता है ,
इंद्रधनुषी रंग भी 
समाये हैं मुझमें 
अरूण की किरणों का 
प्रकाश भी मैं हूँ 
दिन का उजाला और                            
धूप की पवित्रता भी मैं हूँ ,
मैं प्रतीक हूँ 
शुद्धता, निष्पक्षता,          
आध्यात्मिकता का 
गम, खुशी ,सादगी 
शांति, मासूमियत, अच्छाई का 
मैं प्रतीक हूँ स्वर्ग दूतों का 
दूध की पवित्रता भी मुझमें 
कफन की चादर भी मुझमें 
फूंँक-फूंँक कर रखना 
पड़ता है हर कदम मुझे 
क्योंकि ! जरा सी कालिख भी            
मुझ पर बड़ी दिखाई देती है 
मैं सबको छिपा लेता हूँ 
पर नहीं छिप सकता मैं कहीं
जरा सा दाग ही मुझे 
कर देता है कलंकित 
लेकिन  ! तुम रहना नकली                  
सफेदपोशों से बच के 
पड़कर इनके चक्कर में 
सफेद भी स्याह हो जाता है। 
धर्म-कर्म, ईमान सब
स्वाहा ! हो जाता है। 


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