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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



पीढ़ी का परिवर्तन


डॉ दिग्विजय शर्मा "द्रोण"


      
आज की हमारी युवा पीढ़ी
विसंगतियों की ओर
अत्यंत तेजी के साथ
बढ़ती चली जा रही है।
समाज में कभी कभी 
ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है
परिवर्तित परिस्थितियों में पुराने
आदर्श, मूल्य और सामाजिक आशाएँ
समाप्त होती चली जाती हैं,
अर्थहीन बन जाती हैं।
उनके स्थान पर
नए आदर्श, मूल्य, आशाएं 
बन नही पाती।
पाश्चात्य संस्कृति की
विसंगतियां स्थापित हो जाती है।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति 
समझ ही नही पाता,
कि समाज उससे क्या चाहता है,
क्या आशा करता है।
वह अपने को अनिश्चित 
शून्य स्थिति में पाता है।
उसकी अवधि चाहे 
कुछ भी क्यों न हो।
समय के साथ ऐसी स्थिति में उसमेँ
व्यावहारिक असंगति
व् असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है,
यही विसंगति की दशा है।
व्यक्ति संगति से 
असंगति की ओर चला जाता है।
राष्ट्र और संस्कृति को पहचानने
उसे समझने,जानने की आवश्यकता है।
हमें युवाओं को बस आइना दिखाना है,
बदलने की आवश्यकता है।
देश , भाषा, राष्ट्र, धर्म के प्रति भाव 
जाग्रत करते ही श्रेष्ठ कर्म है।
उनके उत्थान की आवश्यकता है,
परिवर्तन की आवश्यकता है।
  

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