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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



डरता हूँ


डॉ दिग्विजय शर्मा "द्रोण"


 
       
खिल उठी धूप
मन हुआ चकोर
बड़े कोहरे में 
दिन गुजरे है।
रात्रि की निशा
घनघोर ठिठुरती 
शरद हवा
मन में खौप
लिए बैठे है।
हर तरफ कोहरा
होरहा अन्धकार है
न कोई दिख रहा
न कोई आस पास है।
ये आँखें भी कुछ 
बयां करती हैं
लगता है
भयानक डर
रोड पर देख कर भयानक
एक्सिडेंट का मंजर
हर तरफ आह 
और कराह है।
कहीं कुत्ते 
तो कहीं बिल्ली
कहीँ पशुओं की 
रोड पर चढ़ी बली है।
सन्नाटा और सन्नाटा
है यहाँ सुन्न अंधियारा
किससे बयां करें
अपने दर्द की दास्तान
जानवर तो क्या
इंसानी रूह भी डरी है।
इंसानियत
भी अब सब जगह
शर्मसार
हैवानियत में
बदल रही है।
जहाँ भी मदद
की उम्मीद करो
वहां बस सब
अपने मकसद
और स्वार्थ
लूट की पड़ी है।
ये कैसे इंसान है
किसे अपना समझें
किसे पराया
किससे दर्द बयां करें
कैसी इंसानियत की कड़ी है।
  

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