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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



ब्रज की होली पर दस कवितायेँ


डॉ दिग्विजय शर्मा "द्रोण"


 
       
  1.ब्रजनारि

अरी घेरौ री ब्रजनारि,
कन्हैया 
होरी खेलन आयो है,
होरी खेलन आयो है, 
होरी खेलन आयो है, 
अरी घेरौ री ..

संग में हैं आये 
उत्पाती बाल,
मटक मटक चले 
अदा की चाल,
हाथनु पिचकारी 
फेंट में गुलालु
पिचकारी रंगन की 
भरि लायो है, 
अरी पकरौ  री... 

डारो मुख पै 
केसरिया रंग आज,
एक भी सखा 
जाय नहीं भाज,
लाज को होरी में 
क्या है काज,
बड़े भागन से, 
बड़े भागन से 
फागुन आयो है, 
अरी रोकौ री ..

दई आज्ञा है
वृषभानु-दुलारी,
सब मिल पकड़ो री 
सिग कृष्ण मुरारी,
सखिन सब हल्ला 
खूब मचायो है, 
अरी पकड़ौ री ..

श्याम की मुरली लई छिनाय,
धरयो है गोपी भेस बनाय,
राधा मन्द-मन्द मुसकाय,
श्याम को 
घूँघट मार नचायो है, 
अरी पकरौ री ..


  2. होली की रारि


अरी होली में है गई रारि री, 
सखियन ने 
मोहन को पकरि लयौ ।

धावा बोल दिया गिरधारी
नन्द गाँव के ग्वाले जे भारी
तक-तक मार रहे पिचकारी
आँख बचाकर कुछ सखियन ने, 
झट से मोहन पकरयो री॥ 
अरी होरी में ....

सखियन के संग भानुदुलारी
ले गुलाल की मुट्ठी भारी
मार रहीं हो गई अँधियारी
दीखे कुछ नहीं तब भी, 
सखियों ने मोहन को पकड़ा ॥ 
अरी होरी में ....

सखा-भेष सखियन ने धरि ल्यौ
सब ने मिल के बादल फारे
जाय अचानक फंदा डारो
छैला को कस कर है जकरो, 
सखियों ने मोहन पकरयो ॥ 
अरी होरी में ...


  3.आई-आई रे होली

आई-आई रे होली, 
देखो आई रे
खेलो फाग बरसाने में
पीली-पीली गुरनारी
रंग भर पिचकारी
देखो मुख पे है मारी
भीगी अंगिया है सारी
आई-आई रे ...

मुख पै मलो है गुलालु
नाचें दै-दै के ताल
भीज गए नंदलाल
हँसैँ सारे गोपी-ग्वाल
आई-आई रे ..

नहीं करत ठिठोली
खा के भाँग की गोली
हम मस्तों की टोली
आज खेले नई होली
आई-आई रे ..

लई श्याम ने भरि पिचकारी,
आज मेरी ओर मारी,
मोरी भीज गई सारी,
मेरी चुनरी बिगारी,
सास देगी मोहे गारी,
कहाँ-से आई बजमारी,
मैं तो लाज की मारी 
घर कैसे मैं जाऊँ,
कछु समझ न पाऊँ,
सखीन संग रंग लै के आऊँ 
ऐसी होरी खिलाऊँ,
या के पीछे पड़ जाऊँ,
कारे से गोरो बनाऊँ
आज खेलें नई होरी
आई आई रे....


4.रंगु बरसे


और महीनों में बरसे–न-बरसे, 
फागुनवा में रस रंग-रंग बरसे ।

कान्हा पे बरसे, और राधा पे बरसे
संग-संग ! ओ-हो संग-संग !
सब गोप-गोपिन पे बरसे 
फागुनवा में ...

राम जी पे बरसे, 
और सीता जी पे बरसे
संग-संग ! ओ-हो संग-संग !
प्यारे हनुमत जी पे बरसे।
फागुनवा में ----

शिव जी पे बरसे, 
और गौरा जी पे बरसे
संग-संग !ओ-हो संग-संग !
प्यारे गणपति पे बरसे ।
फागुनवा में ...

विष्णु जी पे बरसे, 
और लक्ष्मी जी पे बरसे
संग-संग में शेषनाग पे बरसे ।
फागुनवा में ...

ब्रह्मा जी पे बरसे, 
गायत्री जी पे बरसे
संग-संग !ओ-हो संग-संग !
चारों वेदों पे बरसे । 
फागुनवा में ...

मथुरा पे बरसे, 
वृन्दावन पे बरसे
संग-संग !ओ-हो संग-संग !
में बरसाने पे बरसे ।
फागुनवा में ...

बच्चों पे बरसे, 
जवानों पे बरसे
उन पे भी !ओ हो उन पे भी !
बरसे जो अस्सी बरस के ।
फागुनवा में ...

इन पे भी बरसे, 
और उन पे भी बरसे
जय बंसी वाले की ! 
जय बंसी वाले की 
हम हू पे बरसे ।
फागुनवा में ...

  5.बुलावा   

कान्हा तोकू ही बुलाय गई , 
कान्हा तोहे ही ।
मुझे काहे को बुलाय गई , 
मोहे काहे को ?
होली खेलन को बुलाय गई , 
होली खेलन को ।

उसका रूप बताय दे,
बड़े–बड़े नैना कजरा वाली, 
सैन चलावै मन मुस्कावै
कान्हा तोहे ही ।

उस नथ वाली का रंग बताय दे,
गोरा-गोरा रंग चटक साड़ी, 
माथे पै बूंदा सो  
नाक में नथ सी है
लटकाय रही
कान्हा तोहे ही ।

उस नथ वाली कौ 
गाँमु बताय दे,
बरसाना गाँव बताय गई, 
कान्हा तोहे ही ।
उस बूंदा वाली कौ 
नाम बताय दे,
राधा नाम बताय गई, 
कान्हा तोहे ही ।
कान्हा तुझे ही बुलाय गई 
बूंदा वाली, 
कान्हा तोहे ही ।


  6.मत मारे पिचकारी


कान्हा पिचकारी मत मारै, 
मेरी चूनर रंग-बिरंगी है जायगी।

चूनर नई हमारी प्यारे 
हे मनमोहन बंसी वारे
इतनी सुन ले नन्द-दुलारे
पूछेगी वह सास हमारी, 
कहाँ से लीनी भिगोय ॥ 
कान्हा पिचकारी -----

सबका ढंग हुआ मतवाला
दुखदाई त्योहार निराला
हा-हा करतीं हम ब्रजबाला
राह हमारी अब न रोक रे 
मैं रही समझाऊँ तोय ॥ 
कान्हा पिचकारी ------
 
मार दीनी रंग की पिचकारी
हँस-हँस कर रसिया बनवारी
भीग गईं सारी सुंदर ब्रजनारी
राधा ने हरि का पीतांबर खींचा 
मद में खोय  रहे भारी ॥ 
कान्हा पिचकारी ------


  7.पिचकारी

कान्हा पिचकारी मत मारे, 
मेरे घर सास लड़ेगी रे
सास लड़ेगी रे, 
मेरे घर नन्द लड़ेगी रे ॥ 
कान्हा पिचकारी ------

सास डुकरिया मेरी बड़ी खोटी, 
गारी दे, ना देगी मोय रोटी
द्योरानी-जिठानी मेरी जनम की दुश्मन, 
साँझ की सुबह करेंगी रे ॥ 
कान्हा पिचकारी ------

जा-जा झूठ पिया से बोले, 
एक की चार, चार की सोलह
ननद बिजुलिया सी जाय 
पिया के कान भरेगी रे ॥ 
कान्हा पिचकारी ------

कुछ नहीं बिगड़े श्याम तुम्हारा, 
मुझे होएगा देश-निकाला
ब्रज की नारी दे दे ताली, 
मेरी हँसी करेंगी रे ॥ 
कान्हा पिचकारी ------

हा-हा खाऊँ पड़ूँ तोरी पइयाँ, 
डालो श्याम मती गलबहियाँ
नाजुक मोतिन की माला 
मेरी  तो टूट पड़ेगी रे ॥ 
कान्हा पिचकारी ------

  8.कन्हैया घर चलो 

कन्हैया घर चलो गुँइया, 
आज खेलें होली कन्हैया घर।

अपने-अपने भवन से निकरीं, 
कोई सांवल कोई गोरी,
एक-से-एक जबर मदमाती, 
सोलह बरस की छोरी, कन्हैया घर -----

बंसी बजावत, 
मन को लुभावत, 
ऐसो मंत्र पढ़ो री,
सास-ननद से चोरी-चोरी, 
निकर पड़ीं सब गोरी, 
कन्हैया घर ------

कोई लचकत 
कोई मटकति आवत, 
कोई छुप-छुप चोरी-चोरी,
कोई चपला सी चपल चाल, 
कोई झिझकत बदन मरोरी, 
कन्हैया घर --------

अबिर गुलाल अगर और चन्दन, 
केसर भर पिचकारी,
श्यामसुंदर संग होरी खेलें, 
होना हो सो हो री। 
कन्हैया घर --------

  9.खेलें होरी

खेलें मसाने में आजु होरी दिगम्बर, 
खेलें मसाने में होरी, हो!  री ।
भूत-पिसाच बटोरी दिगम्बर, 
खेलें मसाने में होरी, हो!  री ।

गोप न गोपी न श्याम न राधा
ना कोई रोक न कोई बाधा
ना कोई साजन न कोई गोरी , 
खेलें मसाने में होरी, हो!  री ।

लख सुन्दर फागुनी छटा के
मन से रंग गुलाल हटा के
चिता-भस्म भर झोरी दिगम्बर, 
खेलें मसाने में होरी, हो!  री ।

नाचत-गावत डमरूधारी
भाँग पिलावत गौरा प्यारी 
छोड़ें सर्प गरुड़ पिचकारी
पीटें प्रेत ढपोरी दिगम्बर, 
खेलें मसाने में होरी, हो!  री ।

भूतनाथ की मंगल होरी
देख-देख के रीझें गौरी
धन्य-धन्य नाथ अघोरी , 
खेलें मसाने में होरी, हो!  री ।

  10.चैत माह

चैत महिनवा पिया परदेस में,
जियरा में हूक उठे मोरे रामा, 
चैत महिनवा।
को बिन सूनी लागे, 
अंबुआ की डारी,
को बिन सूनों, 
जियरा हो रामा, 
चैत महिनवा।
कोयल बिन सूनी, 
अंबुआ की डारी,
पी बिन सूनों, 
जियरा हो रामा, 
चैत महिनवा।
को बिन सूनो लागे, 
गेंदा को फुलवा,
को बिन सूनों, 
जियरा हो रामा, 
चैत महिनवा।
भौंरा बिन सूनो, 
गेंदा को फुलवा,
पी बिन सूनों, 
जियरा हो रामा, 
चैत महिनवा।
  

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