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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



मैं जिन्दा रहुँगी


चन्द्र मोहन किस्कु


 

मैं जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी आँखों के दोनो कोनों में
दया-दर्द के आँसू बनकर.
मैं जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी बन्द मुट्ठी में
अत्याचार के खिलाफ लड़ाई में
सहयोग देकर.
मै जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी शिराओं में
दुश्मनों को रोकने के लिए
गर्म खून दौड़ाने के लिए
मै जिन्दा रहुँगी
तुम्हारे कदमों पर
एक-एक कदम
कठिन और सत्य की डगर पर
ले जाने के लिए
मै जिन्दा रहुँगी
तुम्हारे दिल में
आजादी की अभिलाषा में
विहंग के जैसे पंख
लगाने के लिए
पवन प्राण, नश्वर देह को
त्याग कर
मै जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी दया और दर्द में
अत्याचार के खिलाफ
जोरदार आवाज में
सत्य की पथ पर अग्रसर
तुम्हारे कदमों में
और वसंती हवा
आजाद पसन्द
पवित्र मन में.
(बहन दामिनी की स्मृति में यह कविता लिखी गई है और उन्हीं को समर्पित की गई है)

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