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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



लड़की


चन्द्र मोहन किस्कु


 

छुटपन में
कम उम्र में
जो लड़की
दौड़ती रहती थी
कित -कित खेल के बहाने
और दौड़कर पार हो जाती थी
समाज की नियम-धरम रेखा से 
जिसे खींचा है
समाज के ही एक दल
शासक मर्दों ने।
वह लड़की ही
अब बड़ी हुई है
उम्र से
अब वह डर रही है
दौड़ना।
डर ,समाज के
उन शासक मर्दों से
औरतों का विकास देखकर
जिसकी सत्ता की
कुर्सी थरथर काँप रही है।
वह लड़की
स्वतंत्र रहना चाहती है
और हाथों से अनंत आकाश
छूना चाहती है
छोटी -बड़ी उँगलियों से
पर कँहा ——–
छू ही नहीं पा रही है।
 
**कित -कित खेल =आदिवासी संताल खेला जाने वाला एक लोकप्रिय खेल।

 

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