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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



दूसरा कौन...


अपर्णा झा


 	


ऐसा अक्सर होता है ...
अकेले सुनसान सड़कों पर चले जा रहे थे
कुछ गुनगुना रहे थे और मुस्कुरा रहे थे
रास्तों ने मुझ से पूछा तुम और दूसरा कौन?
जिससे तुम बातें किये जा रहे हो.

शाम अभी कुछ हुई थी जवां और 
मैं भी थी कुछ मेहरबां
चाय के चुस्कियाँ लिए ,खुद को
कुछ बता रही थी,शाम ने पूछा
तुम हो ....पर दूसरा कौन?
जिसे तुम बता रही हों

चांदनी रात संग तारों की बारात
चाँद भी कुछ रवाँ रवाँ
खूबसूरती को उसके दिखा रही थी
रात ने पूछा तुम हो पर दूसरा कौन?
जिसे तुम जता रही हो...

नीम रात गए सपने थे कुछ जागे जागे से
थपकियाँ सी हाथों से मैं दिए जा रही थी
अंधेरों ने चुपके से कान में कहा
तुम हो पर दूसरा कौन?
जिसे तुम सुला रही हो....

सुबह क्या हुई कि मंदिरों की घंटियां बजी
मन,मन ही मन चिल्लाया
ऐ मंदिरों की घंटिया!थोड़ी देर को चुप हो जा
देखती नही वो है रात का जागा
अब कुछ सोया सोया सा
मंदिर से फिर आवाज येआई 
तुम हो पर दूसरा कौन 
जिसके लिए घंटियों को भी 
मौन करना चाहती हो

मौसमी ताब हो या जाड़ों की आह 
या फिर बसन्त बहार
तुम रहते हो साथ तो और हरदिन
होता है त्योहार

जब तुम नहीं भी हो संग 
फिर भी हमारे होने का एहसास
हरदम हरपल रहता है कि
तुम मेरे साथ हो,तुम मेरे पास हो

हमारी मंज़िल हमारा प्रेम
कोई जिस्मों का बंधन नही 
जिसे छूने से ही लगे पता 
हर जा,हर वक्त हर घड़ी जो संग हो
तो फिर भला क्यों खले मुझको
तन्हाईयाँ,तब्दीलियाँ

ऐ चाँद सितारों ,अंधेरे उजालों
मौसम की हदों, सब जान लो 
ये जो तुम पूछते हो दूसरा कौन
जान लो मेरा महबूब हरवक्त
हरदम मेरे साथ है और 
संग जब तुम्हारे मैं हुआ करती हूं
वो भी मेरे पास है
जिससे होता है मेरा हरपल प्रतिपल
बातों का सिलसिला ,बातों का 
सिलसिला .
     

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