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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



निश्छल प्रेम


डॉ० अनिल चड्डा


   

मैं तुम्हारे प्रेम की 
शर्त पूरी नहीं कर सकता
तुम्हारे प्रेम की खातिर
इस जग को 
नहीं छोड़ सकता
तो क्या मैं 
तुम्हे प्रेम नहीं करता?
यदि मैं 
तुम्हारी शर्त पूरी न करूँ
तो क्या 
तुम्हारे मन में 
मेरे प्रति 
कोई प्रेम नहीं है
यदि ऐसा है
तो तुम्हारा प्रेम
निस्वार्थ नहीं है
और तुम्हे
मुझसे प्रेम नहीं है
तुम्हे तो केवल
अपने से प्रेम है 
और तुम
अपनी क्षुधा के लिये
केवल मुझे पा कर
मुझे अपने तक ही
सीमित रखना चाहती हो
जो निश्चय ही 
एक निश्छल प्रेम नहीं है!
निश्छल प्रेम नहीं है!!

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