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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



दूसरा महेन्द्र नहीं


मोती प्रसाद साहू


शाम हो चुकी थी। महेन्द्र मजदूरी से घर लौटकर अभी हाथ मुुॅह धो ही रहा था, कि उसकी नजर पिता के घर पर पड़ी । देखकर यह प्रतीत हुआ कि पिता जी के यहाॅ कुछ नये मेहमान आये हैं। नये मेहमानों को देख कर महेन्द्र का माथा ठनका । महेन्द्र को समझते देर न लगी । सारा माजरा उसकी समझ में आ गया ।वह सोच में पड़ गया। उसके सामने उसका दुखद अतीत पुनः एक बार जीवित हो उठा। बड़ी मुुश्किल से भुला पाया था। वही अतीत जिसेे याद कर वह प्रायः तनावग्रस्त हो जाता है। ज्यादा दिन नहीं हुए वह भी पढ़ाई करने स्कूल जाया करता था।उसके साथ के दोस्त अभी भी स्कूल आ जा रहे हैं। अपनी अभिलाषाओं एवं अपने लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहे हैं ।उनके अभिभावक उनके लिए पिता की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।जबकि कि वह पढ़ाई के उम्र में खुद एक पुत्री का बाप बन चुका है । आज ही की तरह उस दिन भी घर पर दो नये मेहमान आये थे । उनकी अगुआई उसके मामा ही कर थे। शादी की बात आने पर उसके पिता ने थोडा़ ना नुकुर करने के पश्चात् हामी भर दी थी। जैसे वह इस अवसर की कब से प्रतीक्षा कर रहे हों । बहुतों की बारात की थी । जिनकी जिनकी बारातें उसके पिता कर चुके थे वे भी महेन्द्र के पिता कुबेर से शीघ्र ही ऐसा चाह रहे थे । जिस समाज में कुबेर का उठना बैठना था वहाॅ विवाह शादी को जीवन का सर्वोत्तम कार्य समझा जाता था । और काम भले ही देर से हों किंतु विवाह जैसे शुभ कार्य में देर नहीं होनी चाहिए । उस समाज में हर माॅ-बाप की यह एक साध होती है जिसे वे अपने जीते जी पूरी कर लेना चाहते हैं ।महेन्द्र के पिता की वह साध दरवाजे पर दस्तक दे चुकी थी । वे इसे ठुकराना नहीं चाहते थे । दहेज मिलेगा , सभी नाते रिश्तेदार जुटेंगे , धूम -धड़ाका होगा, नाच -गाना होगा और क्या हैे जिन्दगी मे ? बेचारा महेन्द्र सोलह साल का बालक ही ठहरा, क्या करता ? उसे दुनिया दारी की समझ ही क्या थी ? न चाहते हुए भी उसे वह सब बनना पड़ा जिससे उसके पिता की अभिलाषा तृप्त होती हो ! पालनहार ही जब शत्रु बन जाॅय तो कोई कर भी क्या सकता है ?महेन्द्र का बाल-विवाह कर दिया गया ।

घर में पत्नी आ चुकी थी।अब महेन्द्र गाॅव घर की नजरों में पूर्ण मनुष्य समझ लिया गया था । माॅ बाप की ओर से भी इसी आशय का अप्रत्यक्ष संदेश उसे महसूस कराया जाने लगा।जिसका प्रत्यक्ष अर्थ यह हुआ कि वह अब लड़का नहीं रहा बल्कि एक शादीशुदा आदमी है। उसे भी घर के कार्यों में मदद करनी चाहिए। कुछ कमा कर लाना चाहिए।उसे यह महसूस हो रहा था , कि उसके प्रति माॅ बाप का पहले जैसा प्रेम नहीं रहा । उसकी पत्नी खुद भी पारिवारिक जिम्मेदारी उठाने की स्थिति में नहीं थी ।एक साल के अन्दर माॅ भी बन गयी । अल्प उम्र में माॅ बनने के कारण उसका स्वास्थ्य भी प्रायः खराब ही रहने लगा ।खराब स्वास्थ्य के कारण वह घर का काम भी ठीक से नहीं कर पाती थी। जिस कारण आये दिन घर में कलह होता।महेन्द्र के प्रति माॅ बाप का व्यवहार दयाद जैसा हो गया था । इसके बावजूद भी महेन्द्र अपनी पढ़ाई चालू रखने का पूरा प्रयास कर रहा था ।लेकिन कब तक ? एक दिन कुबेर ने महेन्द्र की रसोई ही अलग कर दी।तब मन मसोस कर उसे पढ़ाई छोडनी ही पड़ी़ । घर के खर्चे तथा पत्नी के दवा आदि के लिए कहीं काम धन्धा तलाशने लगा। भला दस पास करके कौन सी नौकरी पाता ? गाॅव में ही मेहनत- मजूरी करके अपना दिन काटने लगा ।

और तबसे आज पुनः पिता के घर आये अपरिचित मेहमानों को देखकर अपने छोटे भाई मोहन की याद आयी। उसके भविष्य की एक भयावह तस्वीर उसके दिलो दिमाग में खंींच गयी। आॅखों के सामने अॅधेरा छा गया और महेन्द्र वहीं रखी चारपाइ्र्र पर बेैठ गया। महेन्द्र नहीं चाहता था कि बाल -विवाह से उसकी तरह किसी और का भी जीवन नर्क बन जाय । फिर मोहन तो उसका सहोदर हुआ । लेकिन पिता जी को समझायेगा कौेन....... ? तो क्या वह मोहन का जीवन नर्क होने दे ?

नहीं.....?

वह वैसा नहीं होने देगा ।

लेकिन कैसे ?

पिता जी से तो बोल चाल भी नहीं है।

क्या वे मेरी बात मानेंगे........? थोड़ी देर रुक कर...... नहीं, इसमें तो कोई सोच विचार का सवाल ही नहीं होता बाल विवाह एक सामाजिक अपराध है ।इसे रोका ही जाना चाहिए ।इसके लिए कानून भी हमारी सोच के साथ है ।मन में दृढ़ निश्चय करक वह उठा ।दृढ़ निश्चय से दुविधा की बेड़ियाॅ स्वतः समाप्त हो जातीं हैं । उसके कदम अपने आप ही पिता के घर की तरफ चल पडे़।

उसके जाते ही बातचीत का सिलसिला अचानक रुक सा गया । एकाएक बड़े लड़के को इस तरह आया देखकर उसका बाप कुबेर थोड़ी देर अचकचाया ।लेकिन आने का कारण तो पूछना ही था।

कुबेर बोला -“अब क्या लेने आये हो ?”

महेन्द्र ने निर्भीकता से उत्तर दिया ।

“ अपना हक ।”

कुबेर गुस्से में बोला-“ कैसा हक ? कुछ नहीं है तेरा यहाॅ और अगर कुछ है भी तो उसके लिए यही समय मिला तुम्हें! जब घर में मेहमान आयें हों ! ”

महेंन्द्र दृढ़ इरादे से बोला -“ हाॅ !यही उचित समय है ”

कुबेर ने कहा-“बोलो! क्या चाहते हो ?”

महेन्द्र ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा- “ पिता जी; मैं आप से कुछ नहीं चाहता बस मेरी एक बात मान लीजिए । मेरी तरह मोहन का जीवन नर्क मत बनाइए। ”

कुबेर ने कहा-“ साफ-साफ कहो क्या कहना चाह रहे हो ?”

मैं यही कहना चाह रहा हूॅ कि मेरी तरह मोहन का भी बाल -विवाह करके अपने लिए दूसरा महेन्द्र मत बनाइए अभी उसकी उम्र ही क्या है ? उसे पढ़ने दीजिए खेलने दीजिए जब विवाह की उम्र हो जाय तब सोचना । हर काम का एक समय होता है । और वह अपने समय पर ही अच्छा लगता है । कुबेर की आॅखें खुल चुकी थीं। उसको अपनी गलती का अहसास हो गया । उसने महेन्द्र को गले लगा लिया।बाल -विवाह की बात जहाॅ तक हुई थी वहीं पर खत्म हो गयी।एक बाल जीवन नर्क बनते बनते बच गया । कुबेर और महेन्द्र की रसोई फिर से एक हो गयी ।


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