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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



लाडो! ऐसे गीत सुनाओ


अप्रीत ‘अदब’


 
 	  
गीत हों कैसे पूछ रही हो
तो फिर सुन लो बिल्कुल वैसे
अतिश्योक्ति अलंकार से
कालिदास की उपमा जैसे
जिन को गाकर लाज ओढ़कर
मेरे काँधे पर सो जाओ
लाडो! ऐसे गीत सुनाओ

प्रेम निमंत्रण ठुकराए से
रात रात भर अकुलाए से
और तुम्हारे आलिंगन पर
थोड़े थोड़े शरमाए से
ऐसे शब्द गढ़ो तुम जैसे
अधरों पर लालिमा चढ़ाओ
लाडो!ऐसे गीत सुनाओ

बाहर बाहर मुस्काई हो
भीतर से पर भर आई हो
मैं ही केवल यहाँ उपस्थित
किस से जाने घबराई हो ?
ऐसा कर लो बाहें भर लो
और प्रेम के दीप जलाओ
लाडो!ऐसे गीत सुनाओ

तुम में वासे तन-मन मेरा
तुम से है आकर्षण मेरा
हँसकर बोल द्वारिका तेरी
कह दे वृन्दावन है मेरा
अच्छा लाडो यही सही पर
कुछ तो बरसाने का गाओ
लाडो!अब तो गीत सुनाओ
लाडो!तुम भी गीत सुनाओ
 

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