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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



छू के साहिल को लहर जाती है


नवीन मणि त्रिपाठी


   
छू के साहिल को  लहर जाती है ।
रेत नम  अश्क़  से कर  जाती है ।।

सोचता हूँ कि बयाँ कर दूं  कुछ ।
बात दिल में ही ठहर  जाती है ।।

याद  आने लगे हो जब से  तुम ।
बेखुदी  हद से गुजर  जाती  है ।।

कुछ तो खुशबू फिजां में लाएगी ।
जो  सबा आपके  घर जाती  है ।।
     
कितनी ज़ालिम है तेरी पाबन्दी ।
यह जुबाँ  रोज  क़तर जाती है ।।

हुस्न  को  देख  लिया है जब से ।
तिश्नगी  और   सवर  जाती   है।।

ढूढिये   आप   जरा   शिद्दत  से ।
दिल तलक कोई डगर जाती है ।।

कर गया  जख्म की  बातें  कोई ।
रूह सुनकर ही  सिहर  जाती है ।।

जब भी फिरती हैं निगाहें उसकी ।
कोई   तकदीर   सुधर  जाती  है ।।

आशिकों  तक  वहाँ  जाने कैसे ।
तेरे  आने  की  ख़बर  जाती  है ।।

देख कर आपका लहजा साहिब ।
चोट  मेरी  भी  उभर  जाती  है ।।

जब  निकलता  हूँ  तेरे  कूचे  से ।
कोई सूरत तो  निखर  जाती  है ।।

कोशिशें कर चुका हूँ लाखों  पर ।
ये नज़र फिर भी उधर जाती है ।।

बे  अदब   हो  गयी है  याद  तेरीे ।
बे सबब दिल में  उतर  जाती है ।।

जेब का हाल समझ  कर अक्सर ।
आशिकी  हम से मुकर  जाती है ।।

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