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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



धुआं गहरा तो रहेगा


जयशंकर प्रसाद


 	
इस शहर में अंधेरों का पहरा तो रहेगा,
कुछ रहे न रहे धुआं गहरा तो रहेगा। 

जिंदगी तार तार हो जाएगी फिर भी,
दम कोने में कहीं ठहरा तो रहेगा। 

सूख जाएंगे नदी नाले ये दरख्त सभी,
यादें माजी की दिलों में हरा तो रहेगा

इख्तेदार में कोई भी हो छीनेगी जमीनें,
अष्क किसान का यहां बहता तो रहेगा। 

फिक्र मंद तब तक नहीं होगा आदमी,
जब तक हर शय घर में भरा तो रहेगा। 

बिखर जाएंगे ये बस्तियां मेरे हबीब सारे,
मौसमें बहार में भी यहां खिजां तो रहेगा । 

साहिल मिले सभी को ये मुमकिन ही नहीं,
बहर में तूफानों का 'प्रसाद' खतरा तो रहेगा ।

     

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