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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



उजाड़ने गांव घाव बनाना चाहता हूं


जयशंकर प्रसाद


 				

इस शहर को मैं गांव बनाना चाहता हूं,
घने पेड़ों की मैं छांव बनाना चाहता हूं।

परिन्दों को क्या कोई सय्याद ले गया
चंू चूं और कांव कांव बनाना चाहता हूं।

शहरों की गलियों में चैन कहां मिलता है,
वादियों की मैं एक गांव बनाना चाहता हूं । 

इंसानियत मर चुकी है क्या इंसानों में,
इंसानियत का मैं पेड़ लगाना चाहता हूं।

नाप लिया है मैंने गद्दारों का मुंह,
उजाड़ने गांव मैं भाव बनाना चाहता हूं ।

उजाड़ कर जिंदगी जीने का साधन 'प्रसाद'
मौत के लिए मैं घाव बनाना चाहता हूं। 
 
		  	
     

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