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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



मुक़द्दर मुख़्तलिफ़...


बृज राज किशोर 'राहगीर'


  
 
मुक़द्दर   मुख़्तलिफ़   सबके, बनाए  हैं ख़ुदा तूने।
न जाने गुल यहाँ क्या क्या, खिलाए हैं ख़ुदा तूने।

किसी  पर पेट भरने की, इनायत  भी न फ़रमाई;
कहीं  अम्बार  दौलत  के, लगाए   हैं  ख़ुदा  तूने।

किसी इन्सान  की ख़सलत, बनाई बेईमानी की;
किसी  को  रास्ते  अच्छे, दिखाए  हैं  ख़ुदा  तूने।

कहीं  उपजाऊ मिट्टी में, फ़सल पैदा न  हो पाई; 
कहीं   चट्टान   में   पौधे, उगाए   हैं   ख़ुदा  तूने।

कभी  रोशन मशालें भी, हवाओं में नहीं टिकती;
दिए  'बृजराज'  आँधी  में, जलाए हैं  ख़ुदा तूने।
 

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