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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



यूँ ही दिन ज़िन्दगी के निकलते रहे


अनिरुद्ध सिन्हा



         यूँ ही दिन ज़िन्दगी के निकलते रहे 
         वक़्त  के  साथ चेहरे  बदलते  रहे 

         हम न जीते कभी हम न  हारे कभी 
         बस  ज़माने  के  साँचे में ढलते रहे 

         हौसला  मुश्किलों  में  भी टूटा नहीं 
         हम गिरे और  गिरकर  संभलते रहे

         उसके मिलने में  वो गर्मजोशी  रही 
         देखकर जिसको पत्थर पिघलते रहे 

         नींद आँखों से  दामन बचाती  रही
         दिल में यादों के जुगनू मचलते रहे 

 

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