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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



क्या ही अच्छा वो कर गया चुपचाप


अनिरुद्ध सिन्हा



      क्या ही अच्छा वो कर गया चुपचाप 
      मेरे  दिल में उतर  गया  चुपचाप 

      मुश्किलों  का   जवाब   देने  में 
      एक अरसा गुज़र  गया  चुपचाप  

      तल्ख़ यादों की खिड़कियाँ  खुलते 
      इक नशा था  उतर गया चुपचाप 

      चाँद को  चाँद कह  दिया  जबसे
      घर उजालों से  भर  गया चुपचाप 

      क्या  अदालत   उसे  सज़ा  देगी
      ख़ुदकुशी कर जो मर गया चुपचाप 
 
 

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