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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



इतना प्रिय तेरा दर्द प्रिये


डॉ० अनिल चड्डा


 	



इतना प्रिय तेरा दर्द प्रिये, कुछ और दर्द को बढ़ा दो ना,
सहलाओ चाहे न ज़ख्म मेरे, यादों का मरहम लगा दो ना !

तेरी प्रेम-सुधा वैतरणी में, अवसाद में डूबा-उतरा हूँ,
अपने नयनों की नाँव बना, मुझको तुम पार लगा दो ना ।

दिन जल्दी-जल्दी ढ़लता है, पर रात बहुत ही लम्बी हो,
तुम हौले-हौले ख्यालों में, आ करके मुझे सुला दो ना ।

अधर में लटकी प्यास मेरी, तेरे अधरों से मिलन की है,
तुम अपने अधरों को दो पल, कभी नाम मेरा बतला दो ना !

हर श्वास मेरी, हर आस मेरी, बस टिकी तेरे विश्वास पे है,
गिर के उठता, उठ के गिरता, दो पल तो हाथ थमा दो ना !

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