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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



भूल गये हो


डॉ० अनिल चड्डा


 	

किस तरह प्यार है जताना, भूल गये हो,
मुस्करा कर पास आना, भूल गये हो।

अपनी मसरूफ्तियों को, थोड़ा आराम दो,
लुत्फे क़ुदरत उठाना, भूल गसे हो।

जब से दुनिया सलाम करने लगी,
खुदा के दर पे जाना भूल गये हो।

सपने सताएं न मेरी यादों के,
रात को चैन से सोना भूल गये हो।

कभी बात करते थे किसी बहाने से,
अब तो हरेक बहाना भूल गए हो।

खेला किया जिन गलियों में ऊंच-नीच,
उनमें फिर से बुलाना भूल गए हो।

‘अनिल’ का हाथ पकड़े घूमते थे जब,
अब वो मौसम सुहाना भूल गए हो।

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