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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



दोहा बन गए दीप -18


सुशील शर्मा


 
बेरोजगार 
जनसंख्या वृद्धि बनी ,चिंताजनक सवाल। 
बेरोजगार हैं युवा ,जीना हुआ मुहाल।
 
सकारात्मक 
सकारात्मक सोच से मन प्रसन्न हो जाय। 
जीवन मधुवन सा लगे ,ह्रदय कली मुस्काय। 

आशीर्वाद 
मात पिता के चरण में ,सुख मिलता अखंड। 
आशीर्वाद अमित है ,प्रबल अमोघ प्रचंड। 

नैतिकता 
नैतिकता नीचे गिरी,रोते जीवन मूल्य। 
संस्कार औंधे पड़े ,दारू बनी अमूल्य। 

खूबसूरत 
खूबसूरत जीवन है ,जब तू होता संग। 
मौसम प्यारा सा लगे ,मन में रहे उमंग। 

सहनशीलता
सहनशीलता में छुपा ,जीवन का आनंद। 
जो धीरज मन में धरे जीता वो सानंद। 

संवेदना 
जीवन की संवेदना ,दीन दुखी से प्रेम। 
औरों को सुख दीजिये ,आपहु पायो क्षेम। 

सिंहासन 
राजनीति के शोर में दब गई ये आवाज़। 
सिंहासन खाली करो ,जनता का है राज। 

जिम्मेदारी 
जिम्मेदारी से बचें वो हैं कायर पूत। 
कर्तव्यों का पालना झूले पूत सपूत। 

अधिकल्पना
अधिकल्पना काव्य में रचती है संसार। 
लेखन को विस्तृत करे ,दे अनुभूति अपार। 

     

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