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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



दोहा बन गए दीप-16


सुशील शर्मा


 
1-चादर
धानी चादर ओढ़ कर,सोता अपना गांव।
हरियाली सब ओर है,थिरके मन के पांव।

2-संसार
यह संसार असार है,जी का है जंजाल।
सब रिश्ते भ्रम से सजे, जीवन माया जाल।

3-साहित्य
जीवन भर साहित्य से,मिलता है अवदान।
शब्द भाव उर्जित रहें,माँ दो ये वरदान।

4-सौंदर्य
सरल और सौंदर्य में, लिपटा रूप अनूप।
जाड़े में जैसे खिली,प्यारी प्यारी धूप।

5-इतिहास
भारत का इतिहास है, बलिदानों का गीत।
वासंती मधुमास सा, स्वर्णिम कालातीत।

6-अध्ययन
विद्या अध्ययन से मिले,जीवन को गति ज्ञान।
अंदर से पशुता हटे, मानव बने महान।

7-सत्कर्म
जीवन में सत्कर्म को अंग धारिये आप।
ईश्वर का निज पाइए,जल जाएं सब पाप।

8-आचरण
जीवन धन है आचरण,संस्कार है रत्न।
अगर ये दोनों न रहें,व्यर्थ रहे सब यत्न।

9-निमंत्रण
नेह निमंत्रण आ गया,चिठ्ठी संग संदेश।
कुछ दिन बीतेंगे यहां, फिर जाना है देश।

10-आधार
राजनीति के खेल में, वोटें है आधार।
नेता को वोटें दिखें,बाकी सब बेकार।

     

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