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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



दोहा बन गए दीप -15
मंचीय कविता


सुशील शर्मा


 
मंचों की कविता बनी ,कम वस्त्रों में नार। 
नटनी नचनी बन गयी ,कुंद हो गई धार। 

नौसिखिये सब बन गए ,मंचों के सरदार। 
कुछ जोकर से लग रहे ,कुछ हैं लम्बरदार। 

पेशेवर कविता बनी ,कवि है मुक्केबाज। 
मंचों पर अब दिख रहा ,सर्कस का आगाज। 

मंचों पर सजते सदा ,व्यंग हास परिहास। 
बेहूदे से चुटकुले ,श्रंगारिक रस खास। 

भाषाई गुंजन बना ,द्विअर्थी संवाद। 
श्रोता सीटी मारते ,कवि नाचे उन्माद। 

कुछ वीरों पर पढ़ रहे ,कुछ अश्लीली राग। 
कुछ अपनी ही फांकते ,कुछ के राग विराग। 

संस्कार अब मंच के ,फ़िल्मी धुन के संग। 
कविता शुचिता छोड़ कर ,रंगी हुई बदरंग। 

मंचों से अब खो गया ,कविता का भूगोल। 
शब्दों के लाले पड़े ,अर्थ हुए बेडौल। 

अर्थहीन कवि  हो गए ,कविता अर्थातीत। 
भाव ह्रदय के खो गए ,पैसों के मनमीत। 

     

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