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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



दोहे रमेश के होली पर


रमेश शर्मा


 
सच्चाई के सामने ,…...गई बुराई हार !
यही सिखाता है हमें, होली का त्यौहार !!

दिखे नहीं वो चाव अब, …..रहा नहीं उत्साह !
तकते थे मिलकर सभी, जब फागुन की राह !!

होली है नजदीक ही, बीत रहा है फाग !
आया नहीं विदेश से ,मेरा मगर सुहाग !!

पिया मिलन की आस मे, रात बीतती जाग !
बैठ रहा मुंडेर पर,……… ले संदेसा  काग !!

छूटे ना अब रंग यह, छिले समूचे गाल !
महबूबा के हाथ का,ऐसा लगा गुलाल !!

सूखी होली खेलिए, मलिए सिर्फ गुलाल !
आगे वाला सामने , कर देगा खुद गाल !!

पिचकारी करने लगी,… सतरंगी बौछार !
मीत मुबारक हो तुम्हे, होली का त्यौहार !!

देता है सन्देश यह ,…. होली का त्यौहार !
रंजिश मन से दूर कर,करें सभी से प्यार !!

करें प्रतिज्ञा एक हम,होली पर इस बार !
बूँद नीर की एक भी, करें नहीं बेकार !!

छोड पुरानी रंजिशें ,….काहे करे मलाल !
इक दूजे के गाल पर,.आओ मलें गुलाल !!

सूना-सूना है बडा, …..होली का त्योहार !
ओठों पे मुस्कान ले, आ भी जाओ यार !!

दिखी नहीं त्यौहार में, शक्लें कुछ इस बार !
थी जिनकी मुस्कान ही, पिचकारी की धार !! 
 

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