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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

मूर्खता का अधिकार

राजेन्द्र वर्मा

प्राकृतिक नियम के अनुसार, अगर किसी को बुद्धिमानी का अधिकार हासिल है, तो उसे मूर्खता का अधिकार भी मिला हुआ है। कौन किस समय किस अधिकार का उपयोग करता है, यह परिस्थितियों पर निर्भर है। दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं और जब जिस पहलू का उपयोग होता है, उसी के अनुसार आदमी बुद्धिमान या मूर्ख कहलाता है। जब दो पक्षों के बीच कोई कार्य सम्पन्न होता है, तो उसमें एक बुद्धिमान, तो दूसरा मूर्ख सिद्ध होता ही है। मसलन, उम्मीदवार-वोटर, व्यापारी-उपभोक्ता, वकील-मुवक्किल, डॉकटर-मरीज, कवि-श्रोता, लेखक-पाठक, प्रकाशक-लेखक।

मूर्खता के अधिकार करते-करते आदमी बुद्धिमानी के अधिकार का उपयोग करना सीख जाता है। प्रसिद्ध संस्कृत-कवि, कालिदास की किशोर वय की मूर्खता कवियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायी है। सुना जाता है कि वे जिस डाल पर बैठे थे, उसे पीछे की ओर से काट रहे थे। बुद्धिमान पंडितों को कालिदास भा गये। उन्होंने कालिदास को मूर्ख मानकर उसे विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ में न केवल जितवा दिया, बल्कि उनका परस्पर विवाह भी करवा दिया, क्योंकि वे विद्योत्तमा से चिढ़े हुए थे। वह विदुषी थी और उसे अपनी विद्वता पर अहंकार भी था। विद्वता और अहंकार प्रेमी युगल के समान हैं। जहाँ विद्वता होगी, वहीं अहंकार बाँसुरी बजा रहा होगा। बहरहाल, पंडितों की मदद से कालिदास ने विद्योत्तमा को परास्त किया। वे चाहते तो मूर्खता के अधिकार का उपयोग करते हुए विद्योत्तमा के प्रश्नों के उत्तर मुँह खोलकर दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा न कर बुद्धिमानी के अधिकार का उपयोग किया। ऊल-जुलूल सांकेतिक उत्तर देकर जीत हासिल की। विद्योत्तमा कालिदास की अपेक्षा अधिक पढ़ी-लिखी होने के बावज़ूद मूर्ख बन गयी। अगर वह तनिक भी बुद्धिमानी के अधिकार का उपयोग करती तो तब तक शास्त्रार्थ करना निलम्बित कर देती, जब तक श्रीमान कालिदास कथित मौनव्रत न तोड़ देते। लेकिन वह ऐसा न कर सकी, क्योंकि उसे पंडितों पर विश्वास था। अगर उसे तनिक भी आशंका होती कि वह पंडितों द्वारा छली जा रही है, तो वह न कालिदास से शास्त्रार्थ करती और न ही पराजित होती। इससे दो निष्कर्ष निकलते हैं : एक, जहाँ विश्वास है, वहीं विश्वासघात भी; और दो, कोई व्यक्ति स्वयं में बुद्धिमान या मूर्ख नहीं होता, पंडित जिसे जैसा चाहें, वैसा उसे सिद्ध कर देते हैं।

राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक क्षेत्रों में आज भी धूर्त पंडित जगह-जगह मौज़ूद हैं जो हमें वर्षों से मूर्ख बना रहे हैं और हम उनके हाथों मूर्ख बनने में गौरव का भी अनुभव करते हैं। जब कभी हम मूर्ख बनते-बनते रह जाते हैं, तो स्वयं को बुद्धिमान सिद्ध कर ख़ुश हो लेते हैं। मूर्ख बनने पर दुखी होते ही हैं। धूर्तता का शिकार होकर भी हम चंद रुपयों के लालच में, बजाय धूर्तता को समाप्त करने के हम स्वयं धूर्त बनने को तैयार हो जाते हैं और उन्हीं की भीड़ बढ़ाने लगते हैं। इस प्रकार, हम मूर्खता के अधिकार का ही उपयोग करते हैं और बाद में रोना रोते हैं कि माहौल बहुत बिगड़ गया है, असत्य और अन्याय के हाथों संस्कार का लोप होता जा रहा है, व्यवस्था चरमरा रही है। हाय! हमारे बच्चों का क्या होगा?

हम ज्योतिषी के पास जाते हैं कि वह हमारा भविष्य बाँच दे ताकि हम उसके अनुसार अपनी ज़िंदगी को सँवार सकें। हम अपना भविष्य बँचवाते हैं और नाराज़ ग्रहों की शांति के उपाय खोजते हैं, जबकि हमारे दिमाग़ के किसी कोने में यह द्वंद्व चलता रहता है कि अगर पंडित को किसी के भविष्य को बाँचने या सुधारने की शक्ति होती, तो वह सबसे पहले अपनी हालत क्यों न सुधारता! उसे सड़क के किनारे दुकान लगाने की ज़रूरत ही न पड़ती, लेकिन हम अपनी तर्कशक्ति को दरकिनार करते हुए एक कल्पित सुख की प्राप्ति के लिए मूर्खता के अधिकार का उपयोग करते हैं।

प्रेमियों के अनुभव बताते हैं कि प्रेम करना और उसके बाद विवाह भी करना, मूर्खता के अधिकार के उपयोग की पराकाष्ठा है। फिर भी शायद ही कोई इसे मूर्खता के अधिकार के अंतर्गत रखता हो। कहावत ही है कि विवाह वह लड्डू है, जिसे खाकर पछताना है और न खाकर भी। विवाह चाहे प्रेम से फलित हुआ हो अथवा घर वालों के प्रबंध से, वह बुद्धिमानी का फल तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता, पर इसकी मार से जब राम-कृष्ण जैसे दिव्य पुरुष नहीं बच सके, तो आम आदमी की क्या बिसात! इसलिए, पहले हमें मूर्खता के अधिकार का उपयोग कर विवाह करना चाहिए, फिर उसे जीवन-भर निभाने के लिए बुद्धिमानी के अधिकार का उपयोग करना चाहिए। इससे दोनों प्रकार के अधिकार सध जायेंगे और हमें अगर कोई बुद्धिमान नहीं कहेगा, तो मूर्ख भी नहीं कह पायेगा।

भ्रष्टाचार से लड़ने में हम प्रायः अपने मूर्खता के अधिकार का उपयोग करते हैं और अपना क़ीमती वक़्त और ताक़त बर्बाद करते हैं। कुछ लोग जो उसकी रक्षा करने में कटिबद्ध रहते हैं, वे रिश्वत देकर अपना काम करा लेते हैं और अपनों के बीच अपनी बुद्धिमानी का ढिंढोरा पीटते हैं। कभी जब रिश्वत से भी काम नहीं बनता, तो वे दस जगह सम्बंधित बाबू या अफ़सर की बुराई करते हैं और मूर्खता के अधिकार के उपयोग का प्रचार करते हैं।

चुनाव के मौसम में हम नेता के भाषण पर यक़ीन कर उसे वोट देते हैं और एक बार फिर ठगे जाते हैं। इस प्रकार, हम अपनी मूर्खता के अधिकार का पूरा-पूरा उपयोग करते हैं और उँगली पर बने वोट डालने के निशान को लोगों को दिखाते हुए फोटो फेसबुक पर डालते हैं और ऐसा कर हम जैसे अपने बुद्धिमान होने का प्रचार करते हैं, जबकि वास्तव में, हम अपने मूर्खता के अधिकार का प्रचार कर रहे होते हैं। आपके वोट ने अगर नेता को जिता भी दिया, तो वह आपके कभी काम नहीं आ सकता। वह तो केवल उन्हीं के काम आता है, जो वोट डालने के अलावा उसके काम आते रहें और उसकी दलाली करते रहें। जिसे हम एक अच्छा नेता समझ कर वोट देते हैं, वह पूँजीपति का दलाल निकलता है, धर्म को राजनीति की आँच पर पकाता है और दंगा करवाकर वोट बैंक मज़बूत करता है।... उम्मीदवार की हक़ीक़त जानकर हम अगर उसे अपना वोट न डालें, तो भी हम अपनी बुद्धिमानी का प्रचार नहीं कर सकते, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में नेताओं के पास हमें मूर्ख बनाने का अधिकार सुरक्षित रहता है।... जब तक हमें अपने चुने हुए नेताओं को संसद या विधानसभा से वापस बुलाने का अधिकार नहीं, हम यों ही मूर्ख बनाये जाते रहेंगे। हम लाख चतुराई बरतें और अपनी बुद्धिमानी के अधिकार का उपयोग कर लें, नेताओं से नहीं जीत सकते। वे भले ही आपस में जीतें-हारें, लेकिन हमें तो दोनों से ही हारना है। वे अपनी बुद्धिमानी के अधिकार का उपयोग करके ही दम लेंगे और हम न चाहकर भी मूर्खता के अधिकार का ही उपयोग करते रहेंगे। ००


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