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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

'प्रदर्शन कलाओं के माध्यम से सभी विषयों का अध्ययन और अध्यापन संभव है' विषयक सेमिनार सम्पन्न

भक्ति साहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन शोध संस्थान तुलसी भवन उस्मानिया यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर प्रो. प्रदीप कुमार द्वारा ओयू गेस्ट हाउस के आईसीएसएसआर हाॅल में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसका विषय था- 'प्रदर्शन कलाओं के माध्यम से सभी विषयों का अध्ययन कराया जा सकता है'। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन करके किया गया। तत्पश्चात डॉ. एच के वंदना ने गणेश वंदना प्रस्तुत की। सेमिनार डायरेक्टर प्रो. प्रदीप कुमार ने सभी अतिथियों तथा प्रपत्र प्रस्तुतकर्ताओं का परिचय प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम के सम्मानित अतिथि थे- ओयू के कला संकाय के डीन प्रो. ए करुणाकर, आईसीएसएसआर सदर्न डायरेक्टर प्रो. वी ऊषा किरण, अंग्रेजी विभाग अध्यक्ष प्रो. मुरली कृष्णा। विशेष अतिथियों में तेलुगु यूनिवर्सिटी के लोककला विभाग के प्रो. बी. वेंकटेश्वरलू, ओयू साइंस काॅलेज के वाइस प्रिंसिपल प्रो. एस जितेन्द्र कुमार नायक और यूनिवर्सिटी काॅलेज ऑफ आर्ट्स की वाइस प्रिंसिपल डॉ. बी विजया सम्मिलित थे। विशेष आमंत्रित अतिथियों में ओयू हिन्दी डिपार्टमेंट हेड डॉ. माया देवी, डिपार्टमेंट ऑफ हिन्दी यूनिवर्सिटी काॅलेज ऑफ वूमैन की डाॅ. राजश्री पी मोरे, सिकंदराबाद के हिन्दी पीजी कॉलेज डिपार्टमेंट से डाॅ. संगीता, तेलुगु यूनिवर्सिटी के लोककला विभाग के डॉ. जी वेंकन्ना कार्यक्रम में उपस्थित थे। परिचय के पश्चात् सभी आमंत्रित अतिथियों एवं प्रपत्र प्रस्तुतकर्ताओं का प्रो. प्रदीप कुमार एवं सेमिनार समन्वयक प्रो. एस धारेश्वरी ने शाॅल ओढ़ाकर सम्मान किया। वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार श्रीमती सरिता सुराणा ने प्रो.प्रदीप कुमार का शाॅल ओढ़ाकर सम्मान किया। सभी प्रतिभागियों को कार्यक्रम से संबंधित सामग्री के फोल्डर भेंट किए गए।

इस सेमिनार की बीज व्याख्यानकर्ता थीं, ओयू काॅलेज ऑफ एजूकेशन की पूर्व प्राचार्या प्रो. एम. सक्कू भाव्या। उन्होंने अपने वक्तव्य में विषय का विस्तृत परिचय दिया और उसके एकेडमिक और नाॅन एकेडमिक लाभों के बारे में चर्चा की। उनके पश्चात प्रो. ऊषा किरण ने अपने संबोधन में कहा कि वाणिज्य विषय को भी प्रदर्शन कलाओं के माध्यम से पढ़ाया जा सकता है। प्रो. गड्डम वेंकन्ना ने अपनी बात तेलुगु भाषा में रखी और कहा कि भाषा विषयक जानकारी भी प्रदर्शन कलाओं के माध्यम से दी सकती है। प्रो. वेंकटेश्वरलू ने लोकगीत, लोक नृत्य और लोककथाओं के महत्त्व पर प्रकाश डाला। कोटी वूमेंस काॅलेज की डाॅ. संगीता ने भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से लेकर अज्ञेय की 'अदृश्य वीणा' के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि हमें वैसी शिक्षा की आवश्यकता है, जो हमें अपने पैरों पर खड़ा कर सके तथा शिक्षा प्रणाली रोचक होनी चाहिए। डॉ. भार्गवी देशपांडे जी ने गणित विषय को प्रदर्शन कलाओं के माध्यम से कैसे पढ़ाया जाए, इस विषय पर अपना प्रपत्र प्रस्तुत किया। तत्पश्चात विवेकानंद डिग्री कॉलेज की प्रो. एच के वंदना ने हिन्दी काव्य में संगीत पर अपना प्रपत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रोजेक्टर के माध्यम से पृथ्वीराज रासो काव्य, कबीर दास जी के दोहे, विद्यापति की पदावलियों की संगीतमय प्रस्तुति दी। तत्पश्चात भोजनावकाश लिया गया।

द्वितीय सत्र में डाॅ. अफसरुन्निसा ने जयशंकर प्रसाद की कहानी 'छोटा जादूगर', मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुंआ' तथा ऊषा प्रियंवदा की 'वापसी' कहानी पर विस्तार से जानकारी दी और बताया कि किस तरह से इन कहानियों का नाट्यकरण करके उन्हें रोचक ढंग से प्रस्तुत कर उन्हें विद्यार्थियों को पढ़ाया जा सकता है। अंबेडकर यूनिवर्सिटी, औरंगाबाद से आईं डॉ. वैशाली ने कहा कि हर टीचर एक आर्टिस्ट होता है। वह हाव-भाव और भाषा के द्वारा अपनी बात विद्यार्थियों को समझा सकता है। संस्कृत डिपार्टमेंट हेड, बेगमपेट काॅलेज से आईं डॉ.गीता ने सौन्दर्य मीमांसा के बारे में बताया और परिक्ष शर्मा की कृतियों से उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपनी बात रखी। इनके अलावा बाबा साहेब आंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी, औरंगाबाद से पधारी श्रीमती विशाखा और प्रदीप कांबले ने अपने प्रपत्र प्रस्तुत किए। डॉ. संतोष राठौड़ ने हिन्दी को कला के माध्यम से कैसे पढ़ाया जाए, विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। सिन्धु डिग्री काॅलेज, बेगमपेट से डा. इंदिरा नल्ला, डॉ. भीमम्मा मैडम, डॉ. सरिता मैडम, पी. गोपीकृष्णा आदि ने अपने-अपने प्रपत्र प्रस्तुत किए। माधवी लता गंजी मैडम ने विभिन्न प्रकार के पप्पेट्स के द्वारा बच्चों को कैसे विभिन्न विषय पढ़ाए जा सकते हैं, इसकी जानकारी प्रोजेक्टर के माध्यम से दी और स्वयं विभिन्न कठपुतलियों का प्रदर्शन किया। युवा प्रपत्र प्रस्तुतकर्ता प्रियंका भरडे ने अपने प्रपत्र में बताया कि किस प्रकार नृत्य कला के माध्यम से बच्चों को हरेक विषय पढ़ाया जा सकता है। एक साॅफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी छोड़कर उन्होंने कुचिपुड़ी डांस एकेडमी खोलकर इस काम का बीड़ा उठाया है कि कैसे कला के माध्यम से शिक्षा दी जा सकती है। सभी प्रतिभागियों के प्रपत्र बहुत ही सारगर्भित और विषय वैविध्य लिए हुए थे। वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार श्रीमती सरिता सुराणा ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए और पधारे हुए सभी विद्वजनों का आभार व्यक्त किया। अंत में प्रो. प्रदीप कुमार ने सभी प्रतिभागियों, अतिथियों और सेमिनार को सफल बनाने में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस कार्यक्रम के आयोजन में प्रो. पांडु का विशेष सहयोग रहा।

- सरिता सुराणा वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार


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