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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

ऐसी दीवार है दरमियाँ आजकल

आकाश महेशपुरी

ऐसी दीवार है दरमियाँ आजकल वह सुनेगा नहीं सिसकियाँ आजकल खेलता था कभी साथ मेरे वही खोलता भी नहीं खिड़कियाँ आजकल जिसने मुझको सिखाया सबक प्यार का ढूँढता हूँ वही चिट्ठियाँ आजकल अब तो आसान है चाँद का भी सफर बढ़ गईं हैं मगर दूरियाँ आजकल इश्क तो आग है दिल मेरा मोम है यूँ गिराओ नहीं बिजलियाँ आजकल मौज़ करने का "आकाश" मन है मगर उम्र की पड़ गईं बेड़ियाँ आजकल

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