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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

आप गज़ल कह रहे हैं

अजय प्रसाद

जल रहा है वतन ,आप गज़ल कह रहे हैं सदमे में है ज़ेहन ,आप गज़ल कह रहे हैं । कुछ तो शर्म करें अपनी बेबसी पे आप जख्मी है बदन ,आप गज़ल कह रहे हैं । जले घर , लूटी दुकानें, गई कितनी जानें उजड़ गया चमन ,आप गज़ल कह रहे हैं । कर ली खुलूस ने खुदकुशि खामोशी से सहम गया अमन ,आप गज़ल कह रहे हैं । खौफज़दा चीखों में लाचारगी के दर्दोगम, है दिल में दफ़न ,आप गज़ल कह रहे हैं । दोस्ती,भाईचारा,और भरोसे की लाशों ने ओढ़ ली है कफ़न ,आप गज़ल कह रहे हैं । रास्ते,गलियाँ,घर बाज़ार सब वही है मगर है कहाँ अपनापन आप गज़ल कह रहे हैं ।

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