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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

गौरी की होली

प्रिया देवांगन *प्रियू*

एक छोटी सी लड़की थी , उसका नाम था गौरी।

गौरी बहुत ही सीधी साधी लड़की थी।वह किसी से ज्यादा बात नही करती थी।स्कूल में भी वह अपने पढ़ाई - लिखाई से ही मतलब रखती थी । स्कूल में सभी बच्चे मैदान में खेलते थे , लेकिन वह चुपचाप कक्षा में बैठी रहती थी। वह सहमी रहती थी ।क्लास के बच्चे उससे बात करते थे , तभी वह बात करती थी। उसकी कोई सहेली भी नही थी। छुट्टी में बच्चे खेलने के लिये उसको बुलाते थे तो वह जाने से मना कर देती थी। फिर बच्चे भी उसको बुलाना बन्द कर दिये ।

गौरी अकेले रहना पसंद करती थी ।

अचानक गौरी बीमार पड़ गयी।उसके माता - पिता गौरी को अस्पताल ले कर गए। डॉक्टर ने गौरी से पूछा - आपके स्कूल में कितनी सहेलियां है, गौरी चुपचाप थी ।फिर उसके माता-पिता बताये ,गौरी किसी के साथ खेलती नही है , वह अकेली रहती है।डॉक्टर ने सलाह दिया कि - अगर गौरी तुम दुसरे बच्चो के साथ खेलोगी तो जल्दी ही ठीक हो जाओगी।

इसका अकेले रहना ही इसकी बीमारी का कारण है।

2 दिन बाद होली का त्यौहार था। सभी बच्चे मोहल्ले में होली खेल रहे थे ।गौरी खिड़की से बच्चों को होली खेलते ,पिचकारी चलाते देख रही थी तो उसका भी मन हुआ कि मैं भी होली खेलूंगी।लेकिन गौरी को किसी से कहने की हिम्मत नही हुई। और वह चुपचाप देखती रही।

बच्चे होली खेलते - खेलते खिड़की के पास आये फिर गौरी से कहने लगे कि आओ गौरी तुम भी हम लोगों के साथ होली खेलो बहुत मजा आएगा। अब से तुम हमारे साथ रहना ।ऐसे कहकर गौरी के चेहरे में रंग - गुलाल लगाया।गौरी ने भी खुश हो कर सबके चेहरे में रंग लगाया।और उस दिन से गौरी सब बच्चों के साथ मिल - जुल कर रहने लगी।। ये होली उसकी यादगार होली बन गयी।


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