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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

होली अब ...

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'

होली अब कुछ ही दूर है हमसे लेकिन बिन प्रेम-रंग के अन्य रंग डराने लगे हैं होली पर बाजार में कुछ अजीब सा माहौल मायूस लाल रंग बिन बिके ताक रहा सबको पहले से ही धरती रंगी हुई लाल लाल सी होली भी दुखी है इंसान तेरे खूनी फाग से घर-दुकान, खेत-क्यार यहाँ तक देश भी बँटें बँटने-बाँटने का क्रम अब रंगों तक आ गया तू जा रहा किस ओर कुछ पता तुझे इंसान तेरी इस राह में बर्बादी के सिवा कुछ नहीं

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