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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

दिल्ली फुंकती .....

वीरेन्द्र कौशल

दिल्ली फुंकती देख तमाशा निहार रहे लोकतन्त्र धारी एक दूजे पर डाल समस्या निभा रहे ज़िम्मेवारी कब तक ऐसा चलता रहेगा खेल ये धुआंधारी कुछ तो हल ढूंढो रे अब तुम कानूनधारी दिल्ली फुंकती ...... कई जले और फुंकें न दिखता समाधान ज़ारी अपनी ढ़फली अपना राग गा रहे सब दरबारी किसी को कोई फिक्र नहीं ढूंढ़े कोई चमत्कारी कानून व्यवस्था दिखा रही अपनी ही लाचारी दिल्ली फुंकती ...... ज़िन्दगी पर ज़िन्दगी ही पड़ रही अब भारी अतिकुशल भी बन बैठे अब तो बिलकुल अनाड़ी ऐसा होता प्रतीत दर्शक ही है असली खिलाड़ी अपने अपने फायदे ख़ातिर हर कोई बना व्यापारी दिल्ली फुंकती ....... व्यवस्था मौन प्रक्रिया गौन शायद भारी दमनकारी अच्छा साबित करने हेतू सभी बने हैं व्यवहारी कठिन फैसले सर्वहिताय समाधान आमजन हो परोपकारी असली रंग हुये बदरंग सबकी मतलब की य़ारी दिल्ली फुंकती ......


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