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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

कुछ अनछुए पल...

सुरेंद्र सैनी बवानीवाल

लोग बातें बड़ी -बड़ी करते हैं. अकसर शेखी हांका करते हैं. बेशक़ सुनने वाला कोई भी हो, सिर्फ बातों से कुछ नहीं होता. वो जाने क्या समझा करते हैं. कहने को इंसान एक बार मरता है. जब वो दुनिया से कूच करता है. मगर मर तो इंसान तभी जाता है, जब याद करने वाला कोई ना हो. अकेले से हो जाएँ हालात अपने, और साथ देने वाला कोई ना हो. लगता है सागर भी तेरी तरह खुदगर्ज़ है, ज़िंदा रहा तो तैरने ना दिया. मर गया तो डूबने ना दिया. लोगों ने कभी रोने ना दिया. तन्हाईओं में कभी हँसने ना दिया. उम्र तेरे इंतज़ार में निकल गयी "उड़ता ", हालात का मंजर बदलने ना दिया.


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