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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

नारी

डॉ ० सुरंगमा यादव

हे नारी! भूल भी जाओ अपनी लाचारी कब तक बनोगी तुम गांधारी विवेक के चक्षु खोलकर तो देखो साहस भरे पग बढ़ाकर तो देखो अश्रु नीर से स्वप्न कब तक धुलोगी व्यथाओं की पूँजी मन में छिपा कर मधुर हास यूँ हीं कब तक करोगी पाँवों पर अपने अब चल के देखो आँचल को परचम बनाकर तो देखो


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