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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

विलीन होना चाहता हूं

सुनील मिश्रा ' शोधार्थी'

बस, मैं यूं ही मेरा दिल तड़पता है, उसके लिए पर उसका नहीं। तभी मैं उसकी पूर्वाकृति याद करके स्मृतियां खो जाता हूं जादुई सपनों में स्वमं को भूलकर छिपाए रखता हूं अपनी गोपनकथाएं अपने घाव तुम सुखी रहना प्रिय मैं सुखी नहीं मैं झरते हुए पेड़ के फूल- पतों की तरह सूखकर, घुनकर नाश होना चाहता हूं बस।


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