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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

रचती है नारी

शबनम शर्मा

रचती है नारी इक सुदृढ़ संसार, बलिष्ठ छाती, पत्थर से पाषाण दिल, कीमती तोहफे, सुन्दर बाज़ार, नन्हा सा इक विचित्र संसार, सुन्दर खिलौने, भीष्मपिता से आदर्श कृष्ण, राम से देवता, रावण सा दशानंद और कई बलिष्ठ हस्तियाँ, फिर क्यूँ ठुकराई जाती है क्यूँ बनती है मर्द के हाथ की कठपुतली। उठ, बता इन्हें, गर तू न होती, कर क्या लेता अकेला मर्द वर्ग संसार में, दूध से रोटी, कपड़े, मकान के लिए दास है तेरा, तुझे ही अपना महत्व समझाना होगा।


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