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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

नारी

सत्येन्द्र बिहारी

नारी तुम हृदय स्थल की वेदी हो लोक धरा के जीवन में, यत्र तत्र सर्वत्र रमंते निवसति भूमण्डल में । तेरी ज्योतिर्मय आभा की रश्मि बिखरती जग में, पुष्प पल्लवित होता जीवन तेरी पैरो की रज कण में ।। ममता करुणा स्नेह का सौरभ नारी तेरी आँचल में, नभ जल थल सब सिमट गया तेरी एक हथेली में। आशाओं के दीप जलाए जीवन के घनघोर अंधेरों में, नारी तुम हो आधार धरा की विश्व रजत नग पग थल में।। नारी तुम श्रद्धा सुमन हो सब न्यौछावर तेरी चरणों में, शक्ति रूपेण तुम अनुसुइया त्रिभुवन खेले जिसकी गोंद में। अखण्ड सौभाग्य की द्योतक हो तुम विश्व धरा के समतल में, श्रृष्ठी की परिचालक हो तुम त्रिभुवन है पलते तेरी आंचल में ।। सत्य अहिंसा का परचम तुम हो धरती से आकाश में, विश्व विकास की धारा हो तुम कीर्ति फैली तेरी चहुं लोक में, तुम ही आदि तुम ही अंत हो श्रृष्ठी पलती तेरी गोंद में, शीष झुका कर नमन तुझे है तीनो लोक है तेरी चरणों में ।।


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