मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

ज़िन्दगी की नोक-झोंक

रत्ना सिन्हा

ज़िन्दगी बीत गई यूँ ही, इस रूठने मनाने के दौर में! प्यारे लम्हे भी छूटते चले गए, इस रोज रोज की नोक-झोंक में! कई अपने भी पीछे छूट गए, इस आपसी मतभेद के कश्मकश में! और, कई अजनवी भी शामिल होते गए, ज़िन्दगी की इस तन्हाई में! क्या पता, कब और कहाँ ले जाए ज़िन्दगी हमें, इस बदलते ज़माने के दौर में! हम यूँ ही कठपुतली बनते चले गए, इस कम्बख़्त वक्त की हाथों में! कभी हँसना और मुस्कुराना भी भूलते गए, इस भागती ज़िन्दगी के अभाव में! कई दिन, महीने और साल भी गुजरे होंगे, पर, पीछे मुड़ना कभी मुमकिन ना हुआ! आगे का सफ़र सम्भालते सम्भालते, आज इतनी दूर जो निकल आए हम! वक़्त यूँ ही फिसला ज़ाया करता है, ज़िन्दगी की बंद मुठ्ठी से जैसे!


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें