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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

अमृत वृष्टि

रामदयाल रोहज

फागुन की अमृत वृष्टि लाती चेहरों पर लाली पीकर बूंदों का प्यार मग्न झूमें गेहूँ की बाली नयनों से नयन लङाता है लो ठिगना चना बिरानी शरमाकर धरती चूम रही है लम्बी सरसों रानी भूंफोङ निकलकर धरती से भरता मूलों में पानी नस नस में यौवन खेल रहा राई हो गई दिवानी मूर्छित पेङों को खूब मिली संजीवनी पूरित प्याली रग रग में जीवन दौङ रहा ले आए कोंपल लाली महीनों से टीले ने खोली निज लक्ष कुसुम की आँखें धरती पर उतर रही किरणें फैलाकर स्वर्णिम पाँखें

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