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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

फाल्गुन

राजीव कुमार

फूल बसंती बहार हुई, और मन हुआ मस्त मलंग आओ खेलें होली संग-संग, भीगे मन और अंग-अंग, कोयल की तान भी बीखरी है, किसी की रंगत और निखरी है, कर लो आज मस्तियां सारी, लेकिन अपनी हद याद रहे, करते चले आए तो हो देष की रक्षा, आज के दिन भी सरहद याद रहे।


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