मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

वक्त

राजीव कुमार

माना कि बहुत गहरे हैं , वक्त से मिले गम, लेकिन कोई बताए कि क्या है, वक्त से बड़ी मरहम, जरा सी बेचैनी मिली तो ठहरा दिए, वक्त को बेहरम, जमाने के ठुकराए हुए पर कोई करे न करे, वक्त ही करता है रहम।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें