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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

कण कण में बसने वाले हे!

डा० नितिषा श्रीवास्तव “कनकपुष्प”

कण कण में बसने वाले हे! कण कण में बसने वाले हे! तुमको प्रणाम, तुमको प्रणाम। तुम सर्वशक्तिमान हो। तुम ही सक्षम का दान हो। तुम ही कृपा निधान हो। कोशों में तुम कुबेर हो। रत्नों में तुम संतान हो। शस्त्रों में तुम ब्र्म्हास्त्र हो। वेदों में तुम तो साम हो। ऋतुवों में तुम वसंत हों। तुम तेज़ हो तुम ताप हो। सबके हृदय में व्याप्त हो। हर कण तुम्ही में है बसा। हर कण तुम्ही से है बना। तुम जननि हो तुम प्राण हो। तुम आत्मा, परमात्मा। तुम ही सजीव और सत्य हो। तुम निर्जीवों में व्याप्त हो। तुम ही दिवा तुम ही निशा। आरंभ तुम, तुम अंत हो। इस लोक में परलोक में। सर्वत्र तुम ही व्याप्त हो। जल में तुम ही, थल में तुम ही। आकाश तुम, पाताल तुम। तुम साधना , तुम वंदना। तृष्णा तुम्ही, तुम तुष्टि हो। याचक तुम्ही, दाता तुम्ही। मोही तुम्ही, निर्मोही तुम। सुख भी तुम्ही, दुख भी तुम्ही। आनंद तुम, तुम संवेदना। शत्रु तुम्ही, तुम मित्र हो। तुम भ्रातृ हो, भगिनी तुम ही। जीवों में तुम नश्वरता। देवो में तुम अमरत्व हो। तुम सत्य हो, साक्षात हो। प्रत्यक्ष तुम, तुम परोक्ष हो। तुम नीव हो, निर्माण हो। शक्ति तुम ही, तुम भक्ति हो। तुम काल हो, तुम चक्र हो। ऋजु हो तुम ही, तुम वक्र हो। नर हो तुम ही, तुम नारी हो। जननी, सखा, गुरु, पितु तुम्ही। तुम स्त्रोत हो, तुम अंत हो। आकार तुम, निराकार तुम। संकल्प तुम, तुम विकल्प हो। नर हो तुम्ही, नारायण हो। तुम शेष हो, तुम पूर्ण हो। साधक तुम्ही, तुम साधना। तुम ईष्ट हो, तुम श्रेष्ठ हो। तुम वर्ण हो, व्यंजन तुम्ही। कण कण में बसने वाले हे! तुमको प्रणाम, तुमको प्रणाम। तुमको प्रणाम, तुमको प्रणाम।।


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