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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

विभाजन की व्यथा

निशा नंदिनी

माँ कहती थी हम भागे थे आधे अधूरे से लेकर दो बच्चों को साथ सारे गहने पहन लिए थे। एक पेटी में बांधा था सामान बड़ी बहन डेढ़ साल की और बड़े भाई चार महीने के थे। पिता की गाढ़ी कमाई से बसाया घर-द्वार छूट रहा था। आँगन में अपने हाथों से रोपे तुलसी के पौधे को देख माँ का चेहरा मुरझा गया था। अपनी प्यारी गाय गौरी को देखकर उसे प्यार कर वो फूट-फूट कर रोई थी। बार-बार अपने साथ ले जाने की जिद्द कर रही थी, मूर्छित हो गिर रही थी। तुम समझती क्यों नहीं हम गौरी को नहीं ले सकते हैं, पिता के समझाने पर भी वो नहीं समझ रही थी। गौरी भी निरीह आँखों से माँ को रोता देख रही थी, सालों का बसाया घर एक पेटी में समाया था। चार माह के पुत्र का पासपोर्ट नहीं था, पिता बहुत घबराए हुए थे सीमा पार करते ही पुत्र को छीन लिया गया था माँ ने चीख पुकार लगा रखी थी बहुत मुश्किल से कुछ ले देकर मामला निपटा था। माँ, भाई को गोद में ले खुशी से चूम रही थी। बच्चे भूख से बिलख रहे थे दूध की कौन कहे पानी भी मुहैया नहीं हो रहा था। माँ,भाई को छाती से लगाए हुई थी, पिता एक हाथ से पेटी और दूसरे हाथ से बड़ी बहन को गोदी में कसकर पकड़े हुए थे। ट्रेन में सफर करते हुए माँ पिताजी दोनों ही बहुत डरे हुए थे, रास्ते भर मारकाट मची थी लाशों के अंबार लगे थे। किसी के बूढ़े माँ-बाप नहीं मिल रहे थे, तो किसी के अन्य परिजन। सब आपाधापी में आधे-अधूरे से भाग कर अपने देश की सीमा तक पहुंचना चाहते थे। उस मंजर को याद कर माँ- पिताजी का कलेजा हिल जाता था। हम बच्चों को जितनी बार वो व्यथा सुनाते थे, उतनी बार आँखों में आँसू छलक आते थे। नई जगह आकर फिर से घर बसाना आसान न था, पर देश की आजादी के साथ इस दर्द को भी निभाना था। नेहरू, जिन्ना दोनों लाशों पर राज कर रहे थे। आजादी का भरपूर जश्न मना रहे थे। विस्थापित व्यथा से उबरने की कोशिश में तिल-तिल कर जल रहे थे।


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