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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

अपनी ज़िन्दगी

जय प्रकाश भाटिया

अपनी गुजरती उम्र में, हम क्या क्या न सह गए, सब कुछ हमारा छीन कर, दुनिया ने क्या दिया, दुनिया जिसे कहते है, नागिन है इसका नाम, लाख आस्तीन में पIला, पर फिर भी डस लिया, कहने को तो कहते है की, सस्ती है यह दुनिया, सब कुछ लुटा के भी हमें, हासिल न कुछ हुआ, अपनी ज़िन्दगी भी हमने, लिख दी थी उनके नाम, शिकवा है फिर भी हमसे, की हमने कुछ नहीं किया, देवदार बन के छूना आसमां, आया न हमको रास, फूलों की डाल सा झुकना, हमने मंज़ूर कर लिया, फिर भी शमा बनकर जलते है रात भर, शायद हमें लग जाए किसी अनजान की दुआ चलते ही जा रहे हैं, मंजिल की चाह में , लगता नहीं अपना कोई, भगवान् के सिवा

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