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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

मृत संवेदना

बीना वीर

जिंदा रहना कितना मुश्किल हो जाता है! जब साँसे तेज हो जाती है हमारी चीख से किसी को दर्द नहीं होता। चीख भी न पाये उस तरह हमारे मुँह पे बाँध दिया जाता है कोई भी कपड़ा, कितने जोर से दबा दिया जाता है हमारे हाथों को! हमारी झटपटाहट देख खुश होता है वो और कर लेता है अपनी मनमानी। हमारे आँसू से नहीं पिघलता वो, संवेदना उसकी जो मृत हो चुकी है...

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