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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

ये चमचमाते लोग

अरूण कुमार प्रसाद

यातना की तंद्रा से अलसायी आंखों में। वासना के लाल डोरे खोजते हैं लोग । संत्रास व संताप से सिहर उठे अंगों में। यौवन का आमंत्रण खोजते हैं लोग । यंत्रणा के तनाव से तने रगों,जिस्म में। संभोग के साथ के अवसर खोजते हैं लोग। पीड़ा की साँसों से उभरे हुए वक्ष में वात्सायन के कामसूत्र खोजते हैं लोग। कल की टूटन और आज के घुटन से बिखरे जुल्फों में साँझ की सर्वजयी शीतलता खोजते हैं लोग । अनास्था के प्रहार से ठहर गये मन में अपने लिए आकर्षण खोजते हैं लोग। आतंक के अहसास से सहमे हुए भंगिमा में हिरनी की कुलांचें मारती अदा खोजते हैं लोग । दमन की चक्की में पिसकर स्तब्ध देहयष्टि में सौन्दर्य का खजुराहो खोजते हैं लोग । भावनाएँ मरी हुई मछली की तरह गँधाता है पर, पढ़े हुए शब्दों के अर्थ यहीं खोजते हैं लोग। इन दहशतजदा,युगों से शोषित,दलित लोगों के शोषण,दमन में भी अपने लिए सुख खोजते हैं लोग। अभाव और भूख से चाहे त्रस्त हों व परेशान अर्थ और रोटी से वे,सुख ही सुख खोजते हैं ये लोग ।


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