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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020


अरूण कुमार प्रसाद

जंगल होता जा रहा है अतीत। सुग्गा चोंच उठाये बैठा। तड़प रहा है तीव्र क्षुधा से। गिलहरियाँ हाथों में पत्थर के टुकड़े उठाये दाँतों को तोड़ता अपना वर्तमान जीने की कर रहा है जी तोड़ कोशिश । गमलों में वन उगाते हुए गौरव से ऊँचे उठे माथों को देख देख कर हैरान है। नदी और हवा गलबाँही दिए लौटने की तैयारी कर रहे हैं अपने ठौर को वापिस। सचमुच उन्हें रोकना है। उन्हें रोकना,उन्हें नहीं दरअसल अपने आपको रोकना है। आईये इन्हें किताबी होने से रोकें हम। पुरातत्वविद खुदाई करके हमारा इतिहास जोड़ें- ऐसी प्रतीक्षा करना । हमारा आज का गुनाह है। हमें अपना इतिहास उत्तरदायित्व की भाँति सौंपना चाहिये। वनों को गमलों से उठाकर धरती पर भी बोना चाहिये।


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