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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

कर्ण और महाभारत

अनिल कुमार

एक से एक रणवीर युद्ध में लड़े थे भ्राता के तीर भ्राता को त्रिशूल से लगे थे खून से धरती लथपथ, लाल थी थी कहानी 'महाभारत' की यह पाण्ड़वों की विजय, कौरवों को हार का मलाल थी कृष्ण भी निरुत्तर हो गये दुर्योधन की जिद्द के आगे पाँच गाँव भी देने से रहे हस्तिनापुर पर जीत-हार थी तब युद्ध का बिगुल बजा था रण महाभारत-सा छिठा था देखते थे जिस छोर पाण्ड़व या कौरवों की सेना की ओर थे भ्राता, बन्धुजन या थी रिश्तों की डोर सब आमने-सामने खड़े थे अस्त्र-शस्त्र धारण कर युद्ध में लड़े थे कुछ मजबूर थे युद्ध को कुछ घमण्ड़ में चूर थे कुछ तटस्थ देखते, युद्ध से दूर थे जो जानते थे, आगे क्या होगा ? दुर्योधन जीतेगा या पाण्ड़वों का हस्तिनापुर होगा ? वह मौन थे, चुपचाप शान्त दुख में पड़े थे घनघोर चल रहे थे बाण कृष्ण ने थामी थी अर्जुन की लगाम साक्षात्कार लेकिन कर्ण से था युद्ध में जिसका लक्ष्य विजय या मरण से था भाई था वह, ज्येष्ठ भ्राता अर्जुन का दान कर दिया था जिसने जीवन दुर्योधन की अखण्ड़ मित्रता पर दे दिये कवच-कुण्ड़ल केवल विमाता के कहने पर और वरदान दिया पाण्ड़वों के पाँच ही रहने पर अब वह कर्ण साधारण नर था साधारण उसका वार था फिर भी उसका अर्जुन पर बिजलियों सा भयंकर प्रहार था थे चकित कृष्ण और अर्जुन लाचार था क्योंकि युद्ध में कठिन उसका संहार था कृष्ण ने फिर से अपना दाव खेला था युद्धभूमि में जब रथ का पहिया जा धसा था कर्ण का भूमि में रथ के पहिये को निकालता इससे पहले सीने में उसके कृष्ण की आज्ञा से अर्जुन का वार था था धराशाही अजय वीर योद्धा ऐसे ही न जाने कितने योद्धा मरे थे जो महाभारत के रण में पाण्ड़व या कौरवों की तरफ से लड़े थे पर दानवीर ने जो किया था जैसा जीवन जी कर वह मरा था इतिहास उसको बार-बार कहेगा भविष्य में भी वह कर्ण दानवीर बलिदानी, सच्चा मित्र ही रहेगा।


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