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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

होली

अमर'अरमान'

फागुन में घिर आए कारे बदरा, करे बयरिया शोर। एक टक पापी मुझे निहारे मेरे दिल का चोर। देख के जिसको छम छम नाचे मेरे दिल का वो चितचोर। फागुन में घिर आए कारे बदरा करे बयरिया शोर। मेरा तन-मन हुआ बावरिया चले ना खुद पर जोर। कूकै लागी फेरि कोयलिया नाचे है मन मोर फागुन में घिर आए कारे बदरा करे बयरिया शोर। खेतोँ की ये छटा सुनहरी हर्षें मन का मोर शज़रो पर छा गई लालिमा निकल आया है बौर। फागुन में घिर आए कारे बदरा करे बयरिया शोर।


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