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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

तपती रही

अल्पा मेहता

तपती रही धूप में रेत की तरह, मोह की बंदिशे जलाती रही यहाँ, इन बंधनो से मुक्त न हो सके इंसान कोई, ये गिरफ्त बड़ी मजबूत है, लोहे की सलाखों की तरह, मर रही है इंसानियत इस भंवर के घेरे में, ईमानदारी भी जैसे दम तोड़ रही है, फँसता जा रहा है इंसान दलदल में यहाँ, जूझता रहता है संयम, हर एक इंसान को उजागर करने यहाँ, पर मिट्टी के मानव अब दानव बन रहे है यहाँ..


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