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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

कुर्ता भले सफेद...जोगीरा सा रा रा रा

आकाश महेशपुरी

नेता नोटों की गड्डी से, खेल रहे हैं खेल। जीवन अपना फीका फीका, मिले नमक ना तेल- जोगीरा सा रा रा रा।। अक्सर क्यों पा जाते कुर्सी, दिल के काले चोर। भोली-भाली जनता रोती, होकर भावविभोर- जोगीरा सा रा रा रा।। अव्वल दर्जे का है झूठा, कुर्ता भले सफेद। उसकी बातों में मत आना, जिसमें लाखों छेद- जोगीरा सा रा रा रा।। मर्यादा को देखो भाई, ये खूंटी पर टांग। देश चलाते नेता जैसे, पी पी करके भांग- जोगीरा सा रा रा रा।। हरी-भरी साड़ी में साली, लड़ने चली चुनाव। नेताओं की भाषा बोले, दिल को देती घाव- जोगीरा सा रा रा रा।। खा खा कर के रिश्वत देखो, अधिकारी हैं लाल। पीला पीला मुखड़ा अपना, पिचके-पिचके गाल- जोगीरा सा रा रा रा।। कैसे खेलें महँगाई में, भाई रंग-अबीर। कैसे खाएं हलुआ पेठा, पूआ पूड़ी खीर- जोगीरा सा रा रा रा।।


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