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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020

सपनों की गांठ

प्रीति शर्मा "असीम"

सामने दूर-दूर तक गाड़ियां ,बसें, ट्रक ,मोटरसाइकिल सवार ,स्कूटर रिक्शा ,ऑटो -रिक्शा वाले एक दूसरे से सटे खड़े थे ।

ट्रेन आने में अभी समय था। हर कोई जरा -जरा सी जगह में अपनी जगह बना रहा था। पैदल चलने वाले गाड़ियों से सटक- सटक कर निकल रहे थे ।आगे निकलने के चक्कर में कुछ ने अपनी गाड़ियां गलत साइड में फंसा ली थी ।हर तरफ से तरह-तरह की आवाजें आ रही थी।

कुछ दूसरे को गाड़ी आगे ले जाते देख गालियां निकाल रहे थे। तमाम भीड़-भाड़ ,गालियों और झगड़ों से दूर पटरी पर नन्ही सी दुबली -पतली उम्र यही कुछ सात- आठ साल से ज्यादा ना रही होगी। बिखरे उलझे बाल मैले फटे कपड़े और कंधे पर बोरी लिए इधर-उधर कुछ ढूंढ रही थी ।मानो अपने खोए हुए बचपन को तलाश रही हो उसे देखते ही मन में जो प्रश्न फूटे उसके उत्तर......???

क्या.... इसके मां-बाप इसे रोकते नहीं है ।इसे पढ़ने के लिए क्यों नहीं भेजा। छोटी सी उम्र और जिंदगी का इतना बोझ लेकिन इन प्रश्नों के उत्तर कहीं नहीं थे ।थी...... तो बस वो लड़की जो नन्हे -नन्हे हाथों से कूड़ा और टूटे-फूटे सामान बटोर के बोरी में भर रही थी ।चलते- चलते वे सड़क के किनारे पड़े कूड़ेदान के 5 आ गई । कूड़ेदान के अंदर तो कूड़ा नाम मात्र और बाहर ज्यादा था कूड़ेदान को देखते ही वो उसकी ओर लपकी।

उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। मानो मुंह- मांगी सपनों की दुनिया मिल गई हो ।

कूड़े के ढेर पर चढ़कर उसने अपनी बोरी उतार कर नीचे रख दी अपने हाथों से कूड़ा बिखेर- बिखेर कर कुछ ढूंढ रही थी ।

कुछ मिलते ही उसके चेहरे पर खुशी भरी चमक फैल जाती थी। मानो कोई मूल्यवान चीज मिल गई हो ।

कूड़े के ढेर से कभी पेप्सी की खाली बोतलें ,छोटे-छोटे टुकड़े, लिफाफे ,साबुन के रैपर अगरबत्ती के खाली डिब्बों को सूंघ कर चंचल हाथों से बोरी में डाल रही थी ।

यह सब उठाते हुए इतनी मुग्ध थी कि मानो अपने बिखरे खिलौने इकट्ठे कर बोरी में डाल रही हो।

तभी कचरे में से कुछ कुछ अपना बहुत पास का मिलते ही उसके हाथ और आंखें ठिठक गई थी ।उसके हाथों में अधिकांश जले बालों वाली, कपड़ों के नाम पर चिथड़ो में लिपटी एक मैली कुचली गुड़िया आ गई थी।

उसे देखते ही उसका सांवला- सा चेहरा खुशी से सुनहरा हो रहा था ।

वह कचरा बटोरना भूल गई। गुड़िया को ऐसे देख रही थी। मानो दोनों एक -दूसरे को अपनी- अपनी कहानी कह रही हों ।

गाड़ी निकल चुकी थी लोग अपनी अपनी राह चल दिए थे। लड़की ने बोरी में गुड़िया डाली। मानो सारे सपने भर लिए हो। कंधे पर डाल अपने "सपनों की गांठ "अपनी राह चली जा रही थी।


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